शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

गुज़ारिश एक तबदीली की...


इतना आसान भी न होगा कहे भी तो कैसे ...
खुद को जानना एक बड़ी बात होगी
दिल की महफ़िल में चिलमन होते कहाँ है ...हर बात होती है जहां खुली की खुली
पर इसके लिए उन्हें खुद के साथ रहना होगा, भीड़ में रहने की है उनकी आदत बुरी
ऐसे आहे न भर "एकल" सब्र तो कर, वरना आजायेंगे सभी छोड़ के अपना कब्र
तू भी तो नहीं चाहेगा ऐसी महफ़िल, जहाँ गौर फरमाए जो है गुजरे हुए कल
अब वफ़ा ईमान की बातें कौन करता है दब गए है ये शब्द चाँद किताबो के अन्दर
अब उन किताबो को भी कितने पढ़ते है, नए नए तरीके इजात है जमाने के अन्दर
खुद को बदल लो वरना वक़्त रौंद देगा, तेरे आज को कह देगा गुजरा हुआ कल
दोष क्यों देते हो आँखे भी बेकसूर है, दिखाए वाही जो है चहरे के ऊपर
मिलने के तरीके में जरुरत है तबदीली की
नहीं तो दबके रह जाओगे कोनो में किधर
सूना ही होगा पुरानी मजमून है
नज़रे जो बदली तो नज़ारे बदल जायेंगे खुद बा खुद हर दर बदर .... (संदीप दुबे)

रविवार, 16 जनवरी 2011

अर्ज़ ...

मैं शायर हूँ मैं अपनी कदर जनता हूँ , कितना होगा असर इस नज़म का आप पर बखूबी पहचानता हूँ
मेरी रुसवाईयों के लिए गली -गली दौड़ते रहोगे , मैं अल्फाजो से ही महफ़िल को रुलाना जनता हूँ
मैं शायर हूँ अपनी कदर जनता हूँ ...
शब्दों से गुथे आटें में कैसे लगते हैं रुशावायियों के परथन मैं उस कला को जनता हूँ
यूँ चला आया तेरी और वो नहीं था तेरी खूबसूरती की वजह ,वो थी तेरी खुश्बुओ का दौर
तुम सुख जाओ मुझे नहीं हैं गम , मैं तेरी खुश्बुओ को पहचानता हूँ
मैं भांप लेता हूँ हवा का रुख और तेरी खुशबुओं से फिर सारा वोर हो जाता हूँ
मैं शायर हूँ खुद की कदर जनता हूँ , कौन सी नज़्म करेगी आप पर असर, इसे बखूबी जनता हूँ .... संदीप दुबे

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

मासूम

भाव उभरतें लाखो मन में, क्या -२ कलम से लिखता जाऊ
जो छुट गया है उसे लिखू या विरह पे पाया उसको बताऊ
गम नहीं है दिल के अन्दर,दिखता ही नहीं किस पर रोऊ
भाव उभरते लाखो मन में, क्या -२ कलम से लिखता जाऊ
ऐश किया है अब तक जीवन में, खोने पाने का होश नहीं
खाली पड़े है बही खाते ,ऐसा हिसाब जिसमे कोई दोष नहीं
कुछ होगा तब तो दोष दिखे, खोने का दिल में रोष दिखे
गर पा लिया है तो मुस्कुराऊ,जीत की चवन्नी तुम्हे दिखाऊ
ऐसे ही भाव है मन के अन्दर क्या -२ मैं तुमको बताऊ ....
अब आँखों से आँखों को पढ़ते हो ,दिल साफ बिलकुल कोरा पन्ना
उस पर भी तुम शक करते हो ... थोडा हँसाने दो ना जिद्द क्यों करते हो
जीने की होड़ में पैसे पे मरते हो, जाके खुली हवा में साँस लो
कितनी उबासी तुम करते हो ...
अभी उठा के रख दोगे ईष्या के बाज़ार में, गुस्से के अंगार में,
कुत्ते जैसे अपनी जाती के दुश्मन उस मशहूर मंदिर मस्जिद और गुरुद्वार में
अभी अभी तो जगा हूँ... देख के दुनिया मैं रोया हूँ
पेट को भरो नाअ अ अ घर को क्यों भरते हो
फिर भूखो को बेवश करते हो....
खोल दो छल्ले सबको खाने दो ,सुख की नीद खुद को आने दो
तुम्ही बताओ इसके आगे मैं अब तुमको क्या बताऊ ....
है भाव उभरते लाखो मन में क्या-२ कलम से लिखता जाऊ

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

कुछ अजीब सा इतफाक हुआ है जो दुआओं में भी मेरे न हुए, वो मेरे मोहल्ले में घर लिया है

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

हकीकत ...

जैसा भी रहा है जैसा भी है, उस इकलौते की रहमत ही काफी है,

नज़र अंदाज कर जाये ये दुनिया मुझे,पर हकीकत की तस्वीर अब जयादा भाती है

न देना मुझे छलावे के तौफे उससे बेहतर हम तेरे अरमानो को सह लेंगे

जैसा भी होगा तेरे दिल में मेरा दर्ज़ा उसी ओहदे पे हम खुश रह लेंगे

दिल के दरो दिवार पे कोई खली जमी ही नहीं और हिम्मत नहीं की जख्मो पे जख्म सहले

वो दिल बड़े आजीब होतें है दिखातें कुछ है अन्दर कुछ और चीज होतें है

हौशला आफजाई तो करतें है महफ़िल में ..... पर दिलो में मुखालफत के बीज होतें है...

सोमवार, 23 अगस्त 2010

कभी अलविदा ना कहना ...

एक रश्म है जिसकी अदायिगी करतें हैं
उस मक़ाम पे है की तुझे विदा हम कहतें हैं
जैसा भी रहा पर ये रिश्ता खाश है
कभी न टूटेगा ये मेरा अटल विश्वास है
क्या तेरा , क्या मेरा ये बड़े विचार है
लेन देन पर ही क़ायम मेरे विश्वास हैं
लेनदेन के चलन को अनवरत क़ायम रखना
मेरी तरफ की कमियों को खुद ही वहन करना
कुछ इसी बुनियाद पे ये रिश्ता जुडा था
तेरी दौड़ देख के मुझे चलना पड़ा था
इसी वजय से तुझे विश्वास कहता हूँ , कभी न टूटने वाली आश कहता हूँ
खुद की सोच है की छोटा है या बड़ा , पर तेरी छाव में ही मैं हूँ खडा
तू जीतनी मुश्किल से सूरज के पास जायेगा, मेरे हित में उतनी ही छाव छोड़ जाएगा
मैं लेन देन का कायल हूँ यही तुम से चाहता हूं ,मे क्या दूंगा अब अपनी सोच बताता हूं
बर्फ सी जिंदगी , पानी सी मौत ,जग जाहिर है वक़्त परिवर्तन लाएंगा
दिल के शोरो से अनजान ,जब ये शोर तुझे डराएगा
जब थक जाएगा धुप में ,मैं छाया बन के आ जाऊंगा
बूढ़े जिस्म में तेरे आपना जोश बार जाउंगा
तुम को देख के मैं जिया था,तुम मुझे देख के जी उठाना
यूँ ही कयाम रखना इस रिश्ते को , कभी अलविदा ना कहना .........
मेरे उन सिनिअर्स के नाम जो मेरे रहनुमा रहे और जो अब कॉलेज से कोर्स ख़त्म करके जा रहे हैं
संदीप दुबे

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010



सींचा था बागवान ने उसे बड़े प्यार से
चलाना सिखाया था बागवान ने उसे उतने ही प्यार से
बागवान को पता था यह दौलत नहीं हमारी
अमानत है किसी और की बेटी है परायी
फिर भी उसने उसको बेटे कितारह पला
दश्तुर है दुनिया का उसे डोली में बिठाया
उस वक़्त उसके आँखों से आती यही सदा
जहाँ भी रहो वहां हो खुशियों का सवेरा
आज फिर वही बागवान रो रहा है
उजड़ा हुआ है गुलशन अमानत पड़ी है बेजान
आँखों में आज है उसके फिर गमो की झड़ी
दौलत वालो ने जलाई है फिर किसी की बेटी
यही दौर चलता रहा तो कोई न करेंगा बेटी को रुख्शत
पैदा होने से पहले मिटा दी जाएगी ये दौलत
अरे वाह रे इन्सान और वाह तेरी इंसानियत
तू भूल गया है की तू भी करेंगा बेटी को रुख्शत
फिर दुहरायी जाएगी वही पुरानी कहानी
फिर हम देखेंगे दुसरे बागवान के आँखों में पानी ...