शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011
बुधवार, 27 अप्रैल 2011
vo deevani....
सोमवार, 25 अप्रैल 2011
ज़िंदगी एक शौगात!!!!
जग मेरा कहती "आँखों " में बेवसी के अम्बार क्यों ???
क्यों मायुश है इतनी ?... क्यों है दर्द से भरी ?
जिंदगी से तेरी हर पल मिटती आश क्यों ???
कैसी मजबूरी ?,खुद में इतनी बेचारगी क्यों ???
जिंदगी है शौगात !!! तुझे लगाती सवाल क्यों ???
खुद की काबिलियत , हौसले पे यकीं कर !!!
ऐसी भी क्या जिद की... खुद को लगाले आग तू ...
क्या सब पा लेना जिंदगी के एकलौते मायने है ???
फिर उम्मीद के पाव में अधूरी चाहतों के फाँस क्यों ???
क्यों दुखते है उम्मीद के पाव हर पग पे ???
हांफते दिखते है उम्मीदों के नव जवान क्यों ???
ओढ़ लो मायूसी के चादर , उम्मीदों के चराग बुझालो
तुम्हे हँसाने वाला , रुला नहीं सकता... ये अपनी खुदगर्जी को बतालो
कह दो की अपनों से जुड़े हो सिर्फ खुशियों के वास्ते
हमें नहीं मालुम की दिन के बाद होती रात क्यों ???
वो चला गया मुझे छोड़ के मैं अब क्या करुँगी ?
खुद को फ़ना कर जाना प्यार की पहचान क्यों ?
माँ से सच्चा प्यार दुनिया में नहीं दूजा
छुपा लेती है दिल में चहेतों की जलती चिता
अपनी दुनिया के लिए माँ फिर से मुस्कुराती है
इस बात से दुनिया क्यों नहीं कुछ सिख पाती है ?
खुशियों से भरी दुनिया में बाते दिवार क्यों बनजाती है ???
बुधवार, 23 मार्च 2011
मैंने सोचा ही नहीं !!!!
राह में यादों के ... राख ही राखा मैंने सोचा ही नहीं ...
अगर सोच भी लेते तो क्या कर पाते
होता वही ... जो आये किसम्त को रास ... ये मैंने सोचा ही नहीं
वक़्त के फैसले पे हमेशा से ऐतराज़ ..... क्यों ???
ये मैंने सोचा ही नही ...
मैंने तो सोचा ... की रहे मेरे लिए खास ....
पर क्यों ये ... मैंने सोचा ही नहीं ....
पर मेरे जैसे कई होंगे खास ....
ये मैंने सोचा ही नहीं ......
जली है तो बुझेगी ही हर आग ये मैंने सोचा ही नही
आज बस धुओं की सुगात ये मैंने सोचा ही नहीं ....
तेरी नज़रो में "वफ़ा " का ये हिसाब ... ये मैंने सोचा है नहीं ...
कुसूरवार मैं नही था
फिर गुनाह में हिस्सेदार ये मैंने सोचा ही नहीं ...
बिना इजाज़त कर दे मुझे कोई छोटेपन का एहसास
ये मैंने सोचा ही नही ...
वक़्त का तकाजा था, जूनून था जो होगया
वरना होता नहीं है कोई ऐसे खास
ये मैंने सोचा है नहीं .....(sandip)
शनिवार, 12 फ़रवरी 2011
गुज़ारिश एक तबदीली की...

इतना आसान भी न होगा कहे भी तो कैसे ...
खुद को जानना एक बड़ी बात होगी
दिल की महफ़िल में चिलमन होते कहाँ है ...हर बात होती है जहां खुली की खुली
पर इसके लिए उन्हें खुद के साथ रहना होगा, भीड़ में रहने की है उनकी आदत बुरी
ऐसे आहे न भर "एकल" सब्र तो कर, वरना आजायेंगे सभी छोड़ के अपना कब्र
तू भी तो नहीं चाहेगा ऐसी महफ़िल, जहाँ गौर फरमाए जो है गुजरे हुए कल
अब वफ़ा ईमान की बातें कौन करता है दब गए है ये शब्द चाँद किताबो के अन्दर
अब उन किताबो को भी कितने पढ़ते है, नए नए तरीके इजात है जमाने के अन्दर
खुद को बदल लो वरना वक़्त रौंद देगा, तेरे आज को कह देगा गुजरा हुआ कल
दोष क्यों देते हो आँखे भी बेकसूर है, दिखाए वाही जो है चहरे के ऊपर
मिलने के तरीके में जरुरत है तबदीली की
नहीं तो दबके रह जाओगे कोनो में किधर
सूना ही होगा पुरानी मजमून है
नज़रे जो बदली तो नज़ारे बदल जायेंगे खुद बा खुद हर दर बदर .... (संदीप दुबे)
रविवार, 16 जनवरी 2011
अर्ज़ ...
मैं शायर हूँ मैं अपनी कदर जनता हूँ , कितना होगा असर इस नज़म का आप पर बखूबी पहचानता हूँमेरी रुसवाईयों के लिए गली -गली दौड़ते रहोगे , मैं अल्फाजो से ही महफ़िल को रुलाना जनता हूँ
मैं शायर हूँ अपनी कदर जनता हूँ ...
शब्दों से गुथे आटें में कैसे लगते हैं रुशावायियों के परथन मैं उस कला को जनता हूँ
यूँ चला आया तेरी और वो नहीं था तेरी खूबसूरती की वजह ,वो थी तेरी खुश्बुओ का दौर
तुम सुख जाओ मुझे नहीं हैं गम , मैं तेरी खुश्बुओ को पहचानता हूँ
मैं भांप लेता हूँ हवा का रुख और तेरी खुशबुओं से फिर सारा वोर हो जाता हूँ
मैं शायर हूँ खुद की कदर जनता हूँ , कौन सी नज़्म करेगी आप पर असर, इसे बखूबी जनता हूँ .... संदीप दुबे
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