रविवार, 23 मई 2010

माँ...


चाहता तो हूँ पर चाह ही रह जाती है ,

फ़ैल जातें है दूर तक रास्तें फकत राह ही रह जाती है

चाहता तो हूँ की हर आह में चाह भर दूं

भटके न पग कोई खुद कि दहलीज तक प्रकाश कर दूं

पर इस उम्मीद के चराग को दहलीज़ पे ही ठंडा पता हूँ ,

सुबह का हवाला देके खुद को बहला जाता हूँ

डांट के कहना मान भी जाओ कब तक यु प्रकाश फैलाओगे,

हम तो जलतें तेरे खातिर हमे खुद तक ही पाओगे

तुम बनना सूरज चाँद जगत के मेरे भी छत पे आ जाना ,

नहीं तो जगजाहिर है ...जग में आगे बढ़ जाना

जैसे नन्हा खग नीड़ में अपने ...बेबस ही राह वो तकता है ,

उभर आये जो उसके पर फिर वो कहाँ ठहरता है

थक जातें है अपनों को महशुस कर ,अब वो भी राह नहीं तकते ,

आगे बढ़ना ही जीवन है ,अपनों से शबक वो यही पढ़तें

घर आँगन कि बातों से ,मुझे चुप करा जाती है ,

मेरी माँ वही कहती है ,जो आप कि माँ समझाती है

हाँ हम अब बड़े हो गए है जिद पे भी अड़े पड़े है ,

माँ ने भी हार कहाँ मानी है ,खा ,पि के ठीक से रहना ,ये कहना पुरानी कहानी है ....................


































































































बुधवार, 5 मई 2010

क्या लिखूं ..............

चलो आज ऐसे भी देखलो , जब अरमान आँखों से टपक रहेहैं

बड़े शक्त दिखने वाले ये बुत ,आज मोम की तरह पिघल रहें हैं

हर रोज लहरों के हौसले साहिल को छु के ही टूट जातें हैं

आज वो हौसले सुनामी बनके मिलो मिल को सागर कर रहें हैं

न पुछ की इसकी वजय क्या है मेरे साथी

अभी और लिखूंगा जो अरमान है बाकि

जब खुद को अश्को में और डुबो लूँगा

तब जाके इन्ही नजरो से नैपकिन की खबर लूँगा

डरता हूँ अश्क सुखाने में कुछ भूल न जाऊ

फिर तेरे लिए ये कहानी मैं खुद दुहारू

अरे बहुत करोगे तो खामोश रह जाओगे नहीं तो

तारीफ मे संदीप के लिए वाह- वाह फर्माओगे ....

अरे दर्द तब नहीं होता जब मे ये कहानी सुनता हूँ

दर्द तो तब होता है जब तेरी ख़ामोशी या वाह वाह में खुद को पता हूँ