शुक्रवार, 9 जुलाई 2010



सींचा था बागवान ने उसे बड़े प्यार से
चलाना सिखाया था बागवान ने उसे उतने ही प्यार से
बागवान को पता था यह दौलत नहीं हमारी
अमानत है किसी और की बेटी है परायी
फिर भी उसने उसको बेटे कितारह पला
दश्तुर है दुनिया का उसे डोली में बिठाया
उस वक़्त उसके आँखों से आती यही सदा
जहाँ भी रहो वहां हो खुशियों का सवेरा
आज फिर वही बागवान रो रहा है
उजड़ा हुआ है गुलशन अमानत पड़ी है बेजान
आँखों में आज है उसके फिर गमो की झड़ी
दौलत वालो ने जलाई है फिर किसी की बेटी
यही दौर चलता रहा तो कोई न करेंगा बेटी को रुख्शत
पैदा होने से पहले मिटा दी जाएगी ये दौलत
अरे वाह रे इन्सान और वाह तेरी इंसानियत
तू भूल गया है की तू भी करेंगा बेटी को रुख्शत
फिर दुहरायी जाएगी वही पुरानी कहानी
फिर हम देखेंगे दुसरे बागवान के आँखों में पानी ...

AASHAYE

ललक से भरी बाजुओ से ही , हँस के छु लेंगे तारे ।
बंद कर लेंगे मुट्टी में हम आशमा के सब चमकते सितारे
सदियों से खड़े है इसी आश में हम आपनी बाहे फैलाये ।
इसी ललक हसरत के खातिर ,पंछी को देखा पंख फैलाये ।
होगा कोई न कोई जग का कोना इसी आश में उड़ रहे है सारे
वीरान तन्हाई में देखिये तो खड़े पेड़ को कह रहा है , हमसे कितने दूर है तारे
इसी आश में खड़ा है केवल आपने सपनों के सहारे
नज़र से देखिये सभी है खड़े अपने -अपने सपनों के सहारे
सब सपने नहीं होते अपने सपनों के सहारे क्यों जीवन गुजरे ,
ये भी सच है कल की हकीकत हैं सपने, उनके बिना कैसे जीवन गुजरे।
रक्षक कहूँ या भक्षक कहू जिस तुफा ने तोडा है सपना पेड़ का
जानता हूँ की पेड़ बता न पता सितारों की दूरी रह जाती उसकी तम्मना अधुरी
पर तुफा ने ही दी है हमको ये आश की आता न तुफा तो वो छु लेता आकाश...

सोमवार, 5 जुलाई 2010

honor killing

बर्दाश्त की सबके हद होती है ,मर्द तू आपनी हद पे कब आएगा
कब समझेगा उसकी जरुरत या 'अर्धांगिनी' शब्द किताबो में ही मारा जायेगा ।
तू अनंत ,तू अचल ,सचल है , कब तक ये गायेगा ,तू स्वतंत्र है गायेजा
पर उसी को की भी तू सुनले कबतक वो सह पायेगा ।
सुलगती आग विराम ही है ,कभी भी को धधक जायेगा ।
जो धधका वो शोला नहीं नहीं शैलाबजो पल में थम जायेगा
शांत हूआ कब क्रोध शक्ति का महा प्रलय वो लायेगा ,पद चाप नहीं वक़्त की कोई सोता ही रह जायेगा ।
मर्द ही मर्द रखना जहाँ में ,वो वक़्त आखिरी पीडी कहलायेगा ।
नारी है ,गोंद बबूल की नहीं फिर इज्ज़त उसी से क्यों चिपक जाती है ,
बदलें दौर में सब बदला ये चीज बिन तबदीली के कैसे रहा जाती है
उसकी धैर्य की सीमा को तुने क्षितिज समझ रखा है ,
लिवाज से लेके उसके जीने -मरने का सारा जिम्मा ले रखा है
जी में आया लपेट दिया लम्बा सा लिवाज जिसमे कदम सहम के रह जायेगा
उसके आधे से कपडे में तू खुश हो जातें हो ,लम्बे लम्बे पग रख के आगे ही जायेगा
मादक सा है रूप नारी का बुर्का तक बनवा डाला ,नही बंद किया आँखों को जो कहलाती माय का प्याला ।
नज़रो पे जो पर्दा जो होता तू भी ये तय कर जाता ,भरा पड़ा है काम घरो में जिसपे मर्द ने नज़र न डाला
कभी जो कहता सिर्फ उसी की जिसके गले में डाले वरमाला ,
जिन्दा ही रखा वहां जहाँ सासों का दौर भी संभल न पाया
मर्द ही मुजरिम ,मर्द ही मुंशिफ ,फिर तो अबला ही कही जाएंगी बाला
घर की इज्ज़त लड़की है और खुद चकला जाता है इज्ज़तवाला...

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

कैसा मंज़र


किस मोड़ के मंज़र को देखता हूँ ;
वो अपने हुए गैर के फासलों को पढ़ता हूँ ।
वो वाही हैं जो कभी उम्मीद के आश थे ,
वो भी उनके वही हैं जो कभी विश्वास थे ।
वो कौन सा ऐसा मंज़र है जो अन्धो से उनकी आँखे लिए जाता है ,
ऐसी भी क्या मजबूरी जो आपनो का दिल तोडा जाता है
इस टूटने के दर्द को कुछ ऐसे समझिएगा ,सनम ने नज़र फेर ली हो उस दर्द को कहियेगा ।
पैमाना नहीं फिर भी बेसुमार होता है, बेवफाई का जख्म दिल में ही सोता है ।
अजीब सी कशमकस है की किस दर्द में रोया है , वाकिफ है जहान ,पर बिखरे कांच को कौन संजोया है ।
चार दिन के प्यार में महिवाल और हीर बन जातें हैं , बेसुमार दर्द पे भी वो बाप नहीं रो पाते हैं ।
खुद के तराशे मजबूत महल को यूँ छोड़ जातें हैं, दर्द के ऐसे मकाम पे भी मुस्कुरतें हैं ।
इन्सान एक ऐसा मदारी जो खुद जमूरा बन जाता है , बैठ इस पिंजरे में खुद पे डुगडुगी बजता है ।
टूटी है जब आश की सलाखे ,जिसे वो बरसो से संजोया है ,ऐसा भी मंज़र जहाँ इन्सान मुक्ति पे रोया है
सोता नहीं रातो को कहता है बुरे सपने ने नींद तोडा है ,ऐसा भी मंज़र जब खुली आँखों से सपने संजोया है ।
उगते सूरज को सलाम मैं भी बेटे को बचाऊंगा , बाप को ही मैं कुसूरवार ठहराऊंगा ।
धोती कुर्ता का वक़्त गया पैंट शर्ट को जानता हूँ , ईमानदार हूँ उनका हमसफ़र की मानता हूँ
कहती हैं की इज्ज़त दिल में है तो जताते ही क्यों हो ,
इस लिवाज में झुक के पैरों तक जाते ही क्यों हो ।
लिवाज की छोड़ो महफ़िल में गंवार कहलातें ही क्यों हो ...