ललक से भरी बाजुओ से ही , हँस के छु लेंगे तारे ।बंद कर लेंगे मुट्टी में हम आशमा के सब चमकते सितारे
सदियों से खड़े है इसी आश में हम आपनी बाहे फैलाये ।
इसी ललक हसरत के खातिर ,पंछी को देखा पंख फैलाये ।
होगा कोई न कोई जग का कोना इसी आश में उड़ रहे है सारे
वीरान तन्हाई में देखिये तो खड़े पेड़ को कह रहा है , हमसे कितने दूर है तारे
इसी आश में खड़ा है केवल आपने सपनों के सहारे
नज़र से देखिये सभी है खड़े अपने -अपने सपनों के सहारे
सब सपने नहीं होते अपने सपनों के सहारे क्यों जीवन गुजरे ,
ये भी सच है कल की हकीकत हैं सपने, उनके बिना कैसे जीवन गुजरे।
रक्षक कहूँ या भक्षक कहू जिस तुफा ने तोडा है सपना पेड़ का
जानता हूँ की पेड़ बता न पता सितारों की दूरी रह जाती उसकी तम्मना अधुरी
पर तुफा ने ही दी है हमको ये आश की आता न तुफा तो वो छु लेता आकाश...
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