
सींचा था बागवान ने उसे बड़े प्यार से
चलाना सिखाया था बागवान ने उसे उतने ही प्यार से
बागवान को पता था यह दौलत नहीं हमारी
अमानत है किसी और की बेटी है परायी
फिर भी उसने उसको बेटे कितारह पला
दश्तुर है दुनिया का उसे डोली में बिठाया
उस वक़्त उसके आँखों से आती यही सदा
जहाँ भी रहो वहां हो खुशियों का सवेरा
आज फिर वही बागवान रो रहा है
उजड़ा हुआ है गुलशन अमानत पड़ी है बेजान
आँखों में आज है उसके फिर गमो की झड़ी
दौलत वालो ने जलाई है फिर किसी की बेटी
यही दौर चलता रहा तो कोई न करेंगा बेटी को रुख्शत
पैदा होने से पहले मिटा दी जाएगी ये दौलत
अरे वाह रे इन्सान और वाह तेरी इंसानियत
तू भूल गया है की तू भी करेंगा बेटी को रुख्शत
फिर दुहरायी जाएगी वही पुरानी कहानी
फिर हम देखेंगे दुसरे बागवान के आँखों में पानी ...
प्रशंसनीय ।
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