मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
मासूम
जो छुट गया है उसे लिखू या विरह पे पाया उसको बताऊ
गम नहीं है दिल के अन्दर,दिखता ही नहीं किस पर रोऊ
भाव उभरते लाखो मन में, क्या -२ कलम से लिखता जाऊ
ऐश किया है अब तक जीवन में, खोने पाने का होश नहीं
खाली पड़े है बही खाते ,ऐसा हिसाब जिसमे कोई दोष नहीं
कुछ होगा तब तो दोष दिखे, खोने का दिल में रोष दिखे
गर पा लिया है तो मुस्कुराऊ,जीत की चवन्नी तुम्हे दिखाऊ
ऐसे ही भाव है मन के अन्दर क्या -२ मैं तुमको बताऊ ....
अब आँखों से आँखों को पढ़ते हो ,दिल साफ बिलकुल कोरा पन्ना
उस पर भी तुम शक करते हो ... थोडा हँसाने दो ना जिद्द क्यों करते हो
जीने की होड़ में पैसे पे मरते हो, जाके खुली हवा में साँस लो
कितनी उबासी तुम करते हो ...
अभी उठा के रख दोगे ईष्या के बाज़ार में, गुस्से के अंगार में,
कुत्ते जैसे अपनी जाती के दुश्मन उस मशहूर मंदिर मस्जिद और गुरुद्वार में
अभी अभी तो जगा हूँ... देख के दुनिया मैं रोया हूँ
पेट को भरो नाअ अ अ घर को क्यों भरते हो
फिर भूखो को बेवश करते हो....
खोल दो छल्ले सबको खाने दो ,सुख की नीद खुद को आने दो
तुम्ही बताओ इसके आगे मैं अब तुमको क्या बताऊ ....
है भाव उभरते लाखो मन में क्या-२ कलम से लिखता जाऊ
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
हकीकत ...
जैसा भी रहा है जैसा भी है, उस इकलौते की रहमत ही काफी है,
नज़र अंदाज कर जाये ये दुनिया मुझे,पर हकीकत की तस्वीर अब जयादा भाती है
न देना मुझे छलावे के तौफे उससे बेहतर हम तेरे अरमानो को सह लेंगे
जैसा भी होगा तेरे दिल में मेरा दर्ज़ा उसी ओहदे पे हम खुश रह लेंगे
दिल के दरो दिवार पे कोई खली जमी ही नहीं और हिम्मत नहीं की जख्मो पे जख्म सहले
वो दिल बड़े आजीब होतें है दिखातें कुछ है अन्दर कुछ और चीज होतें है
हौशला आफजाई तो करतें है महफ़िल में ..... पर दिलो में मुखालफत के बीज होतें है...
सोमवार, 23 अगस्त 2010
कभी अलविदा ना कहना ...

उस मक़ाम पे है की तुझे विदा हम कहतें हैं
जैसा भी रहा पर ये रिश्ता खाश है
कभी न टूटेगा ये मेरा अटल विश्वास है
क्या तेरा , क्या मेरा ये बड़े विचार है
लेन देन पर ही क़ायम मेरे विश्वास हैं
लेनदेन के चलन को अनवरत क़ायम रखना
मेरी तरफ की कमियों को खुद ही वहन करना
कुछ इसी बुनियाद पे ये रिश्ता जुडा था
तेरी दौड़ देख के मुझे चलना पड़ा था
इसी वजय से तुझे विश्वास कहता हूँ , कभी न टूटने वाली आश कहता हूँ
खुद की सोच है की छोटा है या बड़ा , पर तेरी छाव में ही मैं हूँ खडा
तू जीतनी मुश्किल से सूरज के पास जायेगा, मेरे हित में उतनी ही छाव छोड़ जाएगा
मैं लेन देन का कायल हूँ यही तुम से चाहता हूं ,मे क्या दूंगा अब अपनी सोच बताता हूं
बर्फ सी जिंदगी , पानी सी मौत ,जग जाहिर है वक़्त परिवर्तन लाएंगा
दिल के शोरो से अनजान ,जब ये शोर तुझे डराएगा
जब थक जाएगा धुप में ,मैं छाया बन के आ जाऊंगा
बूढ़े जिस्म में तेरे आपना जोश बार जाउंगा
तुम को देख के मैं जिया था,तुम मुझे देख के जी उठाना
यूँ ही कयाम रखना इस रिश्ते को , कभी अलविदा ना कहना .........
मेरे उन सिनिअर्स के नाम जो मेरे रहनुमा रहे और जो अब कॉलेज से कोर्स ख़त्म करके जा रहे हैं
संदीप दुबे
शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

सींचा था बागवान ने उसे बड़े प्यार से
चलाना सिखाया था बागवान ने उसे उतने ही प्यार से
बागवान को पता था यह दौलत नहीं हमारी
अमानत है किसी और की बेटी है परायी
फिर भी उसने उसको बेटे कितारह पला
दश्तुर है दुनिया का उसे डोली में बिठाया
उस वक़्त उसके आँखों से आती यही सदा
जहाँ भी रहो वहां हो खुशियों का सवेरा
आज फिर वही बागवान रो रहा है
उजड़ा हुआ है गुलशन अमानत पड़ी है बेजान
आँखों में आज है उसके फिर गमो की झड़ी
दौलत वालो ने जलाई है फिर किसी की बेटी
यही दौर चलता रहा तो कोई न करेंगा बेटी को रुख्शत
पैदा होने से पहले मिटा दी जाएगी ये दौलत
अरे वाह रे इन्सान और वाह तेरी इंसानियत
तू भूल गया है की तू भी करेंगा बेटी को रुख्शत
फिर दुहरायी जाएगी वही पुरानी कहानी
फिर हम देखेंगे दुसरे बागवान के आँखों में पानी ...
AASHAYE
ललक से भरी बाजुओ से ही , हँस के छु लेंगे तारे ।बंद कर लेंगे मुट्टी में हम आशमा के सब चमकते सितारे
सदियों से खड़े है इसी आश में हम आपनी बाहे फैलाये ।
इसी ललक हसरत के खातिर ,पंछी को देखा पंख फैलाये ।
होगा कोई न कोई जग का कोना इसी आश में उड़ रहे है सारे
वीरान तन्हाई में देखिये तो खड़े पेड़ को कह रहा है , हमसे कितने दूर है तारे
इसी आश में खड़ा है केवल आपने सपनों के सहारे
नज़र से देखिये सभी है खड़े अपने -अपने सपनों के सहारे
सब सपने नहीं होते अपने सपनों के सहारे क्यों जीवन गुजरे ,
ये भी सच है कल की हकीकत हैं सपने, उनके बिना कैसे जीवन गुजरे।
रक्षक कहूँ या भक्षक कहू जिस तुफा ने तोडा है सपना पेड़ का
जानता हूँ की पेड़ बता न पता सितारों की दूरी रह जाती उसकी तम्मना अधुरी
पर तुफा ने ही दी है हमको ये आश की आता न तुफा तो वो छु लेता आकाश...
सोमवार, 5 जुलाई 2010
honor killing
बर्दाश्त की सबके हद होती है ,मर्द तू आपनी हद पे कब आएगाकब समझेगा उसकी जरुरत या 'अर्धांगिनी' शब्द किताबो में ही मारा जायेगा ।
तू अनंत ,तू अचल ,सचल है , कब तक ये गायेगा ,तू स्वतंत्र है गायेजा
पर उसी को की भी तू सुनले कबतक वो सह पायेगा ।
सुलगती आग विराम ही है ,कभी भी को धधक जायेगा ।
जो धधका वो शोला नहीं नहीं शैलाबजो पल में थम जायेगा
शांत हूआ कब क्रोध शक्ति का महा प्रलय वो लायेगा ,पद चाप नहीं वक़्त की कोई सोता ही रह जायेगा ।
मर्द ही मर्द रखना जहाँ में ,वो वक़्त आखिरी पीडी कहलायेगा ।
नारी है ,गोंद बबूल की नहीं फिर इज्ज़त उसी से क्यों चिपक जाती है ,
बदलें दौर में सब बदला ये चीज बिन तबदीली के कैसे रहा जाती है
उसकी धैर्य की सीमा को तुने क्षितिज समझ रखा है ,
लिवाज से लेके उसके जीने -मरने का सारा जिम्मा ले रखा है
जी में आया लपेट दिया लम्बा सा लिवाज जिसमे कदम सहम के रह जायेगा
उसके आधे से कपडे में तू खुश हो जातें हो ,लम्बे लम्बे पग रख के आगे ही जायेगा
मादक सा है रूप नारी का बुर्का तक बनवा डाला ,नही बंद किया आँखों को जो कहलाती माय का प्याला ।
नज़रो पे जो पर्दा जो होता तू भी ये तय कर जाता ,भरा पड़ा है काम घरो में जिसपे मर्द ने नज़र न डाला
कभी जो कहता सिर्फ उसी की जिसके गले में डाले वरमाला ,
जिन्दा ही रखा वहां जहाँ सासों का दौर भी संभल न पाया
मर्द ही मुजरिम ,मर्द ही मुंशिफ ,फिर तो अबला ही कही जाएंगी बाला
घर की इज्ज़त लड़की है और खुद चकला जाता है इज्ज़तवाला...
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
कैसा मंज़र

रविवार, 23 मई 2010
माँ...

बुधवार, 5 मई 2010
क्या लिखूं ..............
चलो आज ऐसे भी देखलो , जब अरमान आँखों से टपक रहेहैं
बड़े शक्त दिखने वाले ये बुत ,आज मोम की तरह पिघल रहें हैं
हर रोज लहरों के हौसले साहिल को छु के ही टूट जातें हैं
आज वो हौसले सुनामी बनके मिलो मिल को सागर कर रहें हैं
न पुछ की इसकी वजय क्या है मेरे साथी
अभी और लिखूंगा जो अरमान है बाकि
जब खुद को अश्को में और डुबो लूँगा
तब जाके इन्ही नजरो से नैपकिन की खबर लूँगा
डरता हूँ अश्क सुखाने में कुछ भूल न जाऊ
फिर तेरे लिए ये कहानी मैं खुद दुहारू
अरे बहुत करोगे तो खामोश रह जाओगे नहीं तो
तारीफ मे संदीप के लिए वाह- वाह फर्माओगे ....
अरे दर्द तब नहीं होता जब मे ये कहानी सुनता हूँ
दर्द तो तब होता है जब तेरी ख़ामोशी या वाह वाह में खुद को पता हूँ
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
एहसास
हम भी ये जादू जानतें है तभी तो हम एक निश्चित दायरे मे रहतें है वो दायरा हमारे आपनो को समेटे हुए है हम सबको देख के वो अनुभव नहीं करतें जो अनुभूति हमे आपनो से मिलाती है ,ये भी एक कमाल की कला है , भीड़ है.... जहाँ लोग ही लोग है वाही हम अकेले है , शोर में हमारे लिए शमशान की वीरानी है अगर कोई आपना नहीं ही तो , दूसरी और बर्बादी के किसी भी मंजर सिर्फ एक किसी आपने के चहरे को पा के जहाँ को आपने पास होने की आनुभूति है ,ये इस खाश दुनिया का खाश नियम है जहाँ हर इन्सान रिश्तों के धागों से बुना गुथा है इस रिश्ते रुपी धागे का दायरा बदता जाता है जैसे जैसे हमारे सोचने का दायरा बदता जाता है
मेरे ख्याल से ऐसे ही बढ़तें दायरे का आदर्श स्वरूप है जिसे हम पूरे धरा को एक परिवार सा देखने की बात करतें है जैसे- जैसे हमारा दायरा बढ़ता है हम वैसे ही आपनो की संख्या में वृद्धि पातें है जैसे घर से बहार दोस्तों की दुनिया फिरे मोहल्ले से लगाव फिर ऐसे ऐसे ही ये दायरा बदता जाता है और बढ़ जातें है लोग जिनसे हमारा कोई खून वाला रिश्ता नहीं होता पर वो भी जन्मजात रिश्तो की तरह ही होतें है ......... पर वो जन्मजात रिश्तो की तरह मजबूत नहीं होतें ,शायद सभी रिश्तें टूटतें है ये निर्भर करता है हमारे अन्दर बसे उस रिश्ते के एहसास के ऊपर जिसे रिश्ते रुपी धागे की मजबूती कह सकतें है ये एहसास किसी के प्रति जग सकता है...... चाहे वो आप को उतना तब्बजो देता हो या नहीं अगर ये एहसास किसी के प्रति जग गया तो उस रिश्तें की मजबूती जन्मजात रिश्तें जैसी है
तभी तो हम उसके लिए भी हम वक़्त निकलतें है जो आपने पास नहीं या जो फासले बनाये हुए है ये जान के भी की कोई है जो उसे उतना ही चाहता है जितना उसके आपने सगे चाहते ऐसे चाहने वाले सिर्फ 'चाहते' है और उस शक्स से कुछ भी नहीं चाहते है ये भी एक रिश्ता ही है जो एहसास को आपने दमन मे संजोये हुए है वही एहसास जो की रिश्तें रुपी डोरी की मजबूती को बताता है एहसास
फकत तुमको है चाहा जो गुनाह नहीं
रोका ही कौन है इबादत से किसी को.....
