शनिवार, 17 अप्रैल 2010

एहसास

दुनिया की भीड़ ,कितने लोग ,कितने अलग -अलग तरह के लोग पर कितनी समानताये लिए हुए , ये एक जादू सा है , निःसंदेह एक ऐसा जादू जिसे सिर्फ वाही अंजाम दे सकता है ,जो करतबे दिखाता आ रहा है
हम भी ये जादू जानतें है तभी तो हम एक निश्चित दायरे मे रहतें है वो दायरा हमारे आपनो को समेटे हुए है हम सबको देख के वो अनुभव नहीं करतें जो अनुभूति हमे आपनो से मिलाती है ,ये भी एक कमाल की कला है , भीड़ है.... जहाँ लोग ही लोग है वाही हम अकेले है , शोर में हमारे लिए शमशान की वीरानी है अगर कोई आपना नहीं ही तो , दूसरी और बर्बादी के किसी भी मंजर सिर्फ एक किसी आपने के चहरे को पा के जहाँ को आपने पास होने की आनुभूति है ,ये इस खाश दुनिया का खाश नियम है जहाँ हर इन्सान रिश्तों के धागों से बुना गुथा है इस रिश्ते रुपी धागे का दायरा बदता जाता है जैसे जैसे हमारे सोचने का दायरा बदता जाता है
मेरे ख्याल से ऐसे ही बढ़तें दायरे का आदर्श स्वरूप है जिसे हम पूरे धरा को एक परिवार सा देखने की बात करतें है जैसे- जैसे हमारा दायरा बढ़ता है हम वैसे ही आपनो की संख्या में वृद्धि पातें है जैसे घर से बहार दोस्तों की दुनिया फिरे मोहल्ले से लगाव फिर ऐसे ऐसे ही ये दायरा बदता जाता है और बढ़ जातें है लोग जिनसे हमारा कोई खून वाला रिश्ता नहीं होता पर वो भी जन्मजात रिश्तो की तरह ही होतें है ......... पर वो जन्मजात रिश्तो की तरह मजबूत नहीं होतें ,शायद सभी रिश्तें टूटतें है ये निर्भर करता है हमारे अन्दर बसे उस रिश्ते के एहसास के ऊपर जिसे रिश्ते रुपी धागे की मजबूती कह सकतें है ये एहसास किसी के प्रति जग सकता है...... चाहे वो आप को उतना तब्बजो देता हो या नहीं अगर ये एहसास किसी के प्रति जग गया तो उस रिश्तें की मजबूती जन्मजात रिश्तें जैसी है
तभी तो हम उसके लिए भी हम वक़्त निकलतें है जो आपने पास नहीं या जो फासले बनाये हुए है ये जान के भी की कोई है जो उसे उतना ही चाहता है जितना उसके आपने सगे चाहते ऐसे चाहने वाले सिर्फ 'चाहते' है और उस शक्स से कुछ भी नहीं चाहते है ये भी एक रिश्ता ही है जो एहसास को आपने दमन मे संजोये हुए है वही एहसास जो की रिश्तें रुपी डोरी की मजबूती को बताता है एहसास

फकत तुमको है चाहा जो गुनाह नहीं
रोका ही कौन है इबादत से किसी को.....

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