जग मेरा कहती "आँखों " में बेवसी के अम्बार क्यों ???
क्यों मायुश है इतनी ?... क्यों है दर्द से भरी ?
जिंदगी से तेरी हर पल मिटती आश क्यों ???
कैसी मजबूरी ?,खुद में इतनी बेचारगी क्यों ???
जिंदगी है शौगात !!! तुझे लगाती सवाल क्यों ???
खुद की काबिलियत , हौसले पे यकीं कर !!!
ऐसी भी क्या जिद की... खुद को लगाले आग तू ...
क्या सब पा लेना जिंदगी के एकलौते मायने है ???
फिर उम्मीद के पाव में अधूरी चाहतों के फाँस क्यों ???
क्यों दुखते है उम्मीद के पाव हर पग पे ???
हांफते दिखते है उम्मीदों के नव जवान क्यों ???
ओढ़ लो मायूसी के चादर , उम्मीदों के चराग बुझालो
तुम्हे हँसाने वाला , रुला नहीं सकता... ये अपनी खुदगर्जी को बतालो
कह दो की अपनों से जुड़े हो सिर्फ खुशियों के वास्ते
हमें नहीं मालुम की दिन के बाद होती रात क्यों ???
वो चला गया मुझे छोड़ के मैं अब क्या करुँगी ?
खुद को फ़ना कर जाना प्यार की पहचान क्यों ?
माँ से सच्चा प्यार दुनिया में नहीं दूजा
छुपा लेती है दिल में चहेतों की जलती चिता
अपनी दुनिया के लिए माँ फिर से मुस्कुराती है
इस बात से दुनिया क्यों नहीं कुछ सिख पाती है ?
खुशियों से भरी दुनिया में बाते दिवार क्यों बनजाती है ???

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