रविवार, 16 जनवरी 2011

अर्ज़ ...

मैं शायर हूँ मैं अपनी कदर जनता हूँ , कितना होगा असर इस नज़म का आप पर बखूबी पहचानता हूँ
मेरी रुसवाईयों के लिए गली -गली दौड़ते रहोगे , मैं अल्फाजो से ही महफ़िल को रुलाना जनता हूँ
मैं शायर हूँ अपनी कदर जनता हूँ ...
शब्दों से गुथे आटें में कैसे लगते हैं रुशावायियों के परथन मैं उस कला को जनता हूँ
यूँ चला आया तेरी और वो नहीं था तेरी खूबसूरती की वजह ,वो थी तेरी खुश्बुओ का दौर
तुम सुख जाओ मुझे नहीं हैं गम , मैं तेरी खुश्बुओ को पहचानता हूँ
मैं भांप लेता हूँ हवा का रुख और तेरी खुशबुओं से फिर सारा वोर हो जाता हूँ
मैं शायर हूँ खुद की कदर जनता हूँ , कौन सी नज़्म करेगी आप पर असर, इसे बखूबी जनता हूँ .... संदीप दुबे

3 टिप्‍पणियां:

  1. kya baat hai....
    मैं शायर हूँ मैं अपनी कदर जनता हूँ.
    bahut h achchi line hai...
    keep it up...

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  2. मेरी रुसवाईयों के लिए गली -गली दौड़ते रहोगे , मैं अल्फाजो से ही महफ़िल को रुलाना जनता हूँ .....bahut sundar...ye line dil ko chho gayi...keep it up...

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