
इतना आसान भी न होगा कहे भी तो कैसे ...
खुद को जानना एक बड़ी बात होगी
दिल की महफ़िल में चिलमन होते कहाँ है ...हर बात होती है जहां खुली की खुली
पर इसके लिए उन्हें खुद के साथ रहना होगा, भीड़ में रहने की है उनकी आदत बुरी
ऐसे आहे न भर "एकल" सब्र तो कर, वरना आजायेंगे सभी छोड़ के अपना कब्र
तू भी तो नहीं चाहेगा ऐसी महफ़िल, जहाँ गौर फरमाए जो है गुजरे हुए कल
अब वफ़ा ईमान की बातें कौन करता है दब गए है ये शब्द चाँद किताबो के अन्दर
अब उन किताबो को भी कितने पढ़ते है, नए नए तरीके इजात है जमाने के अन्दर
खुद को बदल लो वरना वक़्त रौंद देगा, तेरे आज को कह देगा गुजरा हुआ कल
दोष क्यों देते हो आँखे भी बेकसूर है, दिखाए वाही जो है चहरे के ऊपर
मिलने के तरीके में जरुरत है तबदीली की
नहीं तो दबके रह जाओगे कोनो में किधर
सूना ही होगा पुरानी मजमून है
नज़रे जो बदली तो नज़ारे बदल जायेंगे खुद बा खुद हर दर बदर .... (संदीप दुबे)
bahut hi achcha likha hai aap ne.......
जवाब देंहटाएंwaakai jeevan ki sachchaai...wah mazaa aa gaya...
जवाब देंहटाएंthank u pramod and vikash
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