बर्दाश्त की सबके हद होती है ,मर्द तू आपनी हद पे कब आएगाकब समझेगा उसकी जरुरत या 'अर्धांगिनी' शब्द किताबो में ही मारा जायेगा ।
तू अनंत ,तू अचल ,सचल है , कब तक ये गायेगा ,तू स्वतंत्र है गायेजा
पर उसी को की भी तू सुनले कबतक वो सह पायेगा ।
सुलगती आग विराम ही है ,कभी भी को धधक जायेगा ।
जो धधका वो शोला नहीं नहीं शैलाबजो पल में थम जायेगा
शांत हूआ कब क्रोध शक्ति का महा प्रलय वो लायेगा ,पद चाप नहीं वक़्त की कोई सोता ही रह जायेगा ।
मर्द ही मर्द रखना जहाँ में ,वो वक़्त आखिरी पीडी कहलायेगा ।
नारी है ,गोंद बबूल की नहीं फिर इज्ज़त उसी से क्यों चिपक जाती है ,
बदलें दौर में सब बदला ये चीज बिन तबदीली के कैसे रहा जाती है
उसकी धैर्य की सीमा को तुने क्षितिज समझ रखा है ,
लिवाज से लेके उसके जीने -मरने का सारा जिम्मा ले रखा है
जी में आया लपेट दिया लम्बा सा लिवाज जिसमे कदम सहम के रह जायेगा
उसके आधे से कपडे में तू खुश हो जातें हो ,लम्बे लम्बे पग रख के आगे ही जायेगा
मादक सा है रूप नारी का बुर्का तक बनवा डाला ,नही बंद किया आँखों को जो कहलाती माय का प्याला ।
नज़रो पे जो पर्दा जो होता तू भी ये तय कर जाता ,भरा पड़ा है काम घरो में जिसपे मर्द ने नज़र न डाला
कभी जो कहता सिर्फ उसी की जिसके गले में डाले वरमाला ,
जिन्दा ही रखा वहां जहाँ सासों का दौर भी संभल न पाया
मर्द ही मुजरिम ,मर्द ही मुंशिफ ,फिर तो अबला ही कही जाएंगी बाला
घर की इज्ज़त लड़की है और खुद चकला जाता है इज्ज़तवाला...
well written. I like when you say that time does not even have a tiptoe. Padchhap nahin waqt ki. So nicely said and such deep meaning. Keep it up. nitin saxena
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