शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

कैसा मंज़र


किस मोड़ के मंज़र को देखता हूँ ;
वो अपने हुए गैर के फासलों को पढ़ता हूँ ।
वो वाही हैं जो कभी उम्मीद के आश थे ,
वो भी उनके वही हैं जो कभी विश्वास थे ।
वो कौन सा ऐसा मंज़र है जो अन्धो से उनकी आँखे लिए जाता है ,
ऐसी भी क्या मजबूरी जो आपनो का दिल तोडा जाता है
इस टूटने के दर्द को कुछ ऐसे समझिएगा ,सनम ने नज़र फेर ली हो उस दर्द को कहियेगा ।
पैमाना नहीं फिर भी बेसुमार होता है, बेवफाई का जख्म दिल में ही सोता है ।
अजीब सी कशमकस है की किस दर्द में रोया है , वाकिफ है जहान ,पर बिखरे कांच को कौन संजोया है ।
चार दिन के प्यार में महिवाल और हीर बन जातें हैं , बेसुमार दर्द पे भी वो बाप नहीं रो पाते हैं ।
खुद के तराशे मजबूत महल को यूँ छोड़ जातें हैं, दर्द के ऐसे मकाम पे भी मुस्कुरतें हैं ।
इन्सान एक ऐसा मदारी जो खुद जमूरा बन जाता है , बैठ इस पिंजरे में खुद पे डुगडुगी बजता है ।
टूटी है जब आश की सलाखे ,जिसे वो बरसो से संजोया है ,ऐसा भी मंज़र जहाँ इन्सान मुक्ति पे रोया है
सोता नहीं रातो को कहता है बुरे सपने ने नींद तोडा है ,ऐसा भी मंज़र जब खुली आँखों से सपने संजोया है ।
उगते सूरज को सलाम मैं भी बेटे को बचाऊंगा , बाप को ही मैं कुसूरवार ठहराऊंगा ।
धोती कुर्ता का वक़्त गया पैंट शर्ट को जानता हूँ , ईमानदार हूँ उनका हमसफ़र की मानता हूँ
कहती हैं की इज्ज़त दिल में है तो जताते ही क्यों हो ,
इस लिवाज में झुक के पैरों तक जाते ही क्यों हो ।
लिवाज की छोड़ो महफ़िल में गंवार कहलातें ही क्यों हो ...

4 टिप्‍पणियां:

  1. मन के भावो को बहुत गहरे से प्रकट किया है ......अति उत्तम रचना ..

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  2. दिन प्रतिदिन बेहतर होती लेखनी,,,सुन्दर रचना ,,,,
    मन के विचारों को अच्छे से अभिव्यक्त किया है,,,

    विकास पाण्डेय
    vicharokadarpan.blogspot.com

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  3. bahut khub sandip bhayi ,yun hi apani lekhani se vicharo ko isi andaj me pesh karate rahiye

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