भाव उभरतें लाखो मन में, क्या -२ कलम से लिखता जाऊ
जो छुट गया है उसे लिखू या विरह पे पाया उसको बताऊ
गम नहीं है दिल के अन्दर,दिखता ही नहीं किस पर रोऊ
भाव उभरते लाखो मन में, क्या -२ कलम से लिखता जाऊ
ऐश किया है अब तक जीवन में, खोने पाने का होश नहीं
खाली पड़े है बही खाते ,ऐसा हिसाब जिसमे कोई दोष नहीं
कुछ होगा तब तो दोष दिखे, खोने का दिल में रोष दिखे
गर पा लिया है तो मुस्कुराऊ,जीत की चवन्नी तुम्हे दिखाऊ
ऐसे ही भाव है मन के अन्दर क्या -२ मैं तुमको बताऊ ....
अब आँखों से आँखों को पढ़ते हो ,दिल साफ बिलकुल कोरा पन्ना
उस पर भी तुम शक करते हो ... थोडा हँसाने दो ना जिद्द क्यों करते हो
जीने की होड़ में पैसे पे मरते हो, जाके खुली हवा में साँस लो
कितनी उबासी तुम करते हो ...
अभी उठा के रख दोगे ईष्या के बाज़ार में, गुस्से के अंगार में,
कुत्ते जैसे अपनी जाती के दुश्मन उस मशहूर मंदिर मस्जिद और गुरुद्वार में
अभी अभी तो जगा हूँ... देख के दुनिया मैं रोया हूँ
पेट को भरो नाअ अ अ घर को क्यों भरते हो
फिर भूखो को बेवश करते हो....
खोल दो छल्ले सबको खाने दो ,सुख की नीद खुद को आने दो
तुम्ही बताओ इसके आगे मैं अब तुमको क्या बताऊ ....
है भाव उभरते लाखो मन में क्या-२ कलम से लिखता जाऊ
dum hai poem me............
जवाब देंहटाएंmaasoom ke dil ki baat ko kaagaz pe hoo-b-hoo utaar diya dubey jii
जवाब देंहटाएंshabdon mein bahut gharai hai ...prastuti bahut lajwaab ....
जवाब देंहटाएंAchhi prastutee....Bahut khoobsurat Panktiyan..
जवाब देंहटाएंisi tarah nirantar jari rakhiye. Shubhkaamnaye.
Vikas pandey
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