बुधवार, 5 मई 2010

क्या लिखूं ..............

चलो आज ऐसे भी देखलो , जब अरमान आँखों से टपक रहेहैं

बड़े शक्त दिखने वाले ये बुत ,आज मोम की तरह पिघल रहें हैं

हर रोज लहरों के हौसले साहिल को छु के ही टूट जातें हैं

आज वो हौसले सुनामी बनके मिलो मिल को सागर कर रहें हैं

न पुछ की इसकी वजय क्या है मेरे साथी

अभी और लिखूंगा जो अरमान है बाकि

जब खुद को अश्को में और डुबो लूँगा

तब जाके इन्ही नजरो से नैपकिन की खबर लूँगा

डरता हूँ अश्क सुखाने में कुछ भूल न जाऊ

फिर तेरे लिए ये कहानी मैं खुद दुहारू

अरे बहुत करोगे तो खामोश रह जाओगे नहीं तो

तारीफ मे संदीप के लिए वाह- वाह फर्माओगे ....

अरे दर्द तब नहीं होता जब मे ये कहानी सुनता हूँ

दर्द तो तब होता है जब तेरी ख़ामोशी या वाह वाह में खुद को पता हूँ

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ! संदीप जी गजब कि रचना .......गजब कि कला है आपके अंदर

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  2. हर रोज लहरों के हौसले साहिल को छु के ही टूट जातें हैं

    आज वो हौसले सुनामी बनके मिलो मिल को सागर कर रहें हैं
    .............behad khubsurat aur vicharniy rachna....
    congratulations Sandeep ji.

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